Kareeb toh mere bhi hai tu..





की वो आकर नशीन हुआ मेरे जिस्म पर,
आँखों मे एक अजब सी प्यास थी उसके,
मुझसे कहने लगा तुम्हे चाहता हु,
मैं सुन रही थी बातें उसकी वो कहने लगा, की मेरी शक्ल सूरत मैं कोई आब नही,
तुम्हारे मेहबूब की आराइश के क्या कहने, शायद मुझमे वो बात नही,
क़रीब तो मेरे भी है तू सच कह रहा हु,
बस तेरी रूह के ही मैं पास नही,
मैं उसे दुनिया जहान से छुपाने लग जाती,
तो पागल सा होकर कहता कि ,
हा अजीज नही हु तुम्हारा,
तो ऐतराज़ करो और दूर रखो ये निगाह तुम,
कुछ गिनती के पल बचे है मेरे पास,
बस देख लेने दो ये चेहरा मुझे बेपनाह तुम,
दम तोड़ ही जाऊँगा बहुत जल्द मैं,
क्यों वक़्त से पहले देती हो मरने की वजह तुम,
*****

एक तरफ़ा आशिक़ था मेरा,
था अफ़सोस तो उसके सीने मैं भी भर कर,
इसी अफसोस मैं मचलता था वो,
मेरे महबूब से जलता था वो,
मेने भी नफरत तो खूब करी उससे,
पर हष्र उसका देख कर वो जिगर रूठ तो जाता था मुझसे,
वो आया था, 
खूनी आबे चश्मा आंखों मैं लिए,
 अपनी आखिरी साँसे हाथो मैं लिए,
कुछ वक़्त तो मुझमे ज़िंदा रहा ,
वो मेरी मोहब्बत मैं शर्मिन्दा रहा,
बेकदर था, बेपरवाह था, पर ज़ख़्मी था वो भी कही,
बेवजह तो बेपरवाह कोई होता नही,
मेने फिर भी उसका ख्याल करा,
रोज उससे सवाल करा, की अब कैसे हो,
वो बड़े दिन तो ख़ामोश रहा,
फिर एक दिन मुझे मेरे महबूब की यादों मैं लिपट कर रोता देख,
मुस्कुरा कर मुझसे कहने लगा कि,
तुम और तुम्हारा मेहबूब कम्बख़त एक ही जैसे हो,
तुम भी तो मेरा इतना ख़्याल ,
मेरे वजूद को एक दिन ख़त्म करने के लिए ही रखते हो,
ज़ख़्मी होकर आया था वो ज़ख़्म मेरा,
अपनी मौत की रंजिश मैं मेरे दिल को बदनाम कर गया था वो!

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