Pahli Mulakat | Hindi Life Poem on mulakaat


poetry


जाने कौन सी सुबह को उसका आना हो गया,
आया भी तो ऐसे की मेरा मिज़ाज़ भी कुछ दीवाना सा हो गया,
थोड़ा ज़्यादा थोड़ा कम है,
ग़म थे, ग़म है,
पर वो हर ग़म को फुसलाने का बहाना हो गया,
हां था तो अंजान ही ,
महज़ एक मुसाफ़िर,
महज़ एक राही,
हां थी तो पहली ही ऐसी रात,
कुछ सुनी उसकी, कुछ सुनाई अपनी बात,
बहके जज़्बात , कुछ महके हालात ,
हा थी तो कुछ चंद मिनट की ही मुलाकात,
पर लगा जैसे उसको जाने एक जमाना हो गया,
मानो जैसे बरसों से सुन रही कोई प्यार का गीत पुराना,
की मैं इंतेज़ार मैं खड़ी थी,
पहली मुलाक़ात की घड़ी थी,
बेहकी साँसे ,भागती धडकने ,कुछ गुनगुनाती सी नफ़्ज़,
जो नाम उसका पढ़ रही थी,
बावरी सी वो मेरे सर चढ़ रही थी,
जब चुुुपके से वो आया मेरी तरफ,
बस उससे लिपट कर, लम्हे का थम जाना हो गया,
मानो बेघर सी धड़कनों को नसीब ठिकाना हो गया,
वो मेरे सारे लापता ख़्वाबों का आशियाना हो गया,
कुछ तो ख़ास था उसमें,
की हर ज़ख़्म का इलाज़ था उसमें,
हाँ समन्दर ही था वो,
ओर कही तो गहराइयों मैं,
मुझे अधूरे से पूरा कर दे वो दफ़न राज़ था उसमें,
फिर डूब कर उसमें शौक से होश गवाना हो गया,।
और होश ऐसे खोना ,
की बेहोश ख़्वाबों को होश आ जाए,
बस डूबना था उसमें,
तैराकी से बदन बस अनजान हो गया,
की मालूम ना था कि ज़िन्दगी मैं इस क़दर रह जायेगा वो,
तन्हाइयो मैं भी,
मेरे होंठो पर मेरा ख़्याल बन मुस्कुराएगा वो,
साँसों की जगह अपना एहसास रख जाएगा,
की फिर साँसों का गुरूर यू टूट जाएगा,
जबसे आकर के अपने रंगो से उसने रंगा है मुझे,
मैं मुझ सी नहीं रही,
मुझमे वो मुझसे ज्यादा है,
बड़े गुरूर मैं रहता है दिल,
ईश्क़ ए फ़ितूर मैं रहता है दिल,
जब से इसकी रातो को तोड़ने उसका आना हो गया।

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